माना तनहाई में घबराए बहुत ,
खुद के भी नजदीक तो आये बहुत !
प्यास की हो जायेगी लंबी उमर ,
आस के बदल अगर छाये बहुत !
तोड़ हम पाए नहीं रिश्तों के भ्रम ,
श्लोक गीता के तो दोहराए बहुत !
क्या हुआ अब किसलिए खामोश हैं ,
लोग जो भीडों में चिल्लाये बहुत !
डॉ. ब्रजेश शर्मा

Comments

pallavi trivedi said…
तोड़ हम पाए नहीं रिश्तों के भ्रम ,
श्लोक गीता के तो दोहराए बहुत !
वाह...बहुत खूब ग़ज़ल है! सभी शेर बेहद प्रभावशाली हैं पर ये शेर ख़ास तौर पर पसंद आया!

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