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Showing posts from June 19, 2008

ग़ज़ल

जो पाया है वो जीना चाहता हूँ , बहुत खामोश रहना चाहता हूँ ! तबर्रुक बाँट देना चाहता हूँ , ग़ज़ल के शेर कहना चाहता हूँ ! में अपनी रूह से होकर मुखातिब , अना के पार जाना चाहता हूँ ! हुई हैं चार आँखें ज़िन्दगी से , में अब हद से गुजरना चाहता हूँ ! फकीरी घुल रही है आशिकी में , करीने से संवरना चाहता हूँ ! डॉ॰ ब्रजेश शर्मा

ग़ज़ल

निगाहें हक़ में तो मासूम को ही माफ़ी है , सजा कबूल करो तुम अगर खता की है ! तमाम तोहमतें उसने हमारे सर कर दीं , हमारी सिम्त से ऐलाने जंग बाकी है ! कितना मुश्किल है तसव्वुर का तर्जुमा करना , बड़ा है काम मगर ज़िन्दगी जरा सी है ! चाँद को छूने की कोशिश हर एक लहर में है , हमें पता है समंदर की रूह प्यासी है ! ठहर भी जाओ मोहब्बत के इस जज़ीरे पर , कितनी हसरत से तुम्हे ज़िन्दगी बुलाती है ! डॉ॰ ब्रजेश शर्मा