Tuesday, March 11, 2014



आज
काफ़ी लंबे अरसे के बाद अपने ब्लॉग पर लौटा हूँ , और इसका श्रेय मेरे एक करीबी दोस्त को जाता है
आज जो संगीत रचनाएं उनसे मिलीं हैं वो मुझे सुरों की सुरीली दुनियां में ले गयी हैं

आबिदा परवीन की जादुई आवाज़ में एक बेहतरीन ग़ज़ल का आनंद लीजियेगा ...........


Tuesday, October 8, 2013

"Shriram Centre For 
Excellence and Personal Growth"  Gwalior.

 “ Learn to Learn " Program
(Only for the students committed to Self Growth.)

·       Goal setting…..  ” Plant the Seed “.
·       Examination Preparations…..” On the runway to Takeoff “
·       To be free from fear of Competition…..” Explore U in U “
·       Interview Techniques……” Just being U as U R “.  
·       Communication Skills……..” Samvaad dil se “.
·       Personality Development…… “ Enjoy the Bliss “.
   
Shriram centre for excellence and Personal growth now brings you a unique 12 week program (25 Interactive days i.e. 50 hours) for art of learning, Goal oriented living, to be free from the fear of competition and total Personality development. We focus on visible change in personality through very simple to follow motivational techniques and tips. We unfold the better and higher dimensions of personality through dialogs. We provide the opportunity to open your self in confidence and get rid of fears and confusions to face the challenge of time and enjoy the Bliss…………. 
                           

                                 
 Consultation, Counseling and Guidance…….
                 (On Pre appointment only) By,

                  Dr. Brijesh Sharma M.A., Ph.D
                                                                       Director
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What after 10th, 12th, Graduation and even after P G ?

Education…?  Career…? Confused ???


Come on …………Let’s  Join...... 

“ Learn to Learn "

We now bring you to the unique 12 weeks program for the art of learning. It will be an enriched journey of 25 Interactive days i.e 50 hours.

We focus on:

·       Zeal – The utmost priority to achieve SUCCESS.
·       Commitment – Necessitates  the faith in yourself.
·       Goal Orientation -  Nurturing the youth to be confident and  competent.
·       All-round Excellence – By unfolding the better and higher dimensions of personality...
 Get ready to
                   Face the Challenges of Time Joyfully.........


       (Admission on merit cum interview basis )

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Curriculum of  “Learn to Learn” Program

1st week  :     Plant a seed  / Know the Desire.
2nd week  :    Creation of Dream / To Conceive a Dream.                                                          3rd week   :    Visualize the Dream.
4th week   :    Making Road map “The Plan “.
5th week   :    On the runway to fly…Getting started.
6th week   :    Belief system / Inhibition.
7th week   :    Coming out of shell.
8th week   :    Joy of Transition.
9th week   :    Fun of Learning.
10th week :    Witnessing the Progress.
11th week :    Faith development.
12th week :   Celebration of Self, Joy of Bliss.

-                For more details please contact :
   Dr.Brijesh Sharma, (M.A, Ph.D)
" RAMAYANAM " , 361, Jiwaji Nagar, Thatipur, Gwalior. 
Ph. 0751-2340922, Mob. 09425443984

Thursday, June 19, 2008

ग़ज़ल

जो पाया है वो जीना चाहता हूँ ,
बहुत खामोश रहना चाहता हूँ !
तबर्रुक बाँट देना चाहता हूँ ,
ग़ज़ल के शेर कहना चाहता हूँ !
में अपनी रूह से होकर मुखातिब ,
अना के पार जाना चाहता हूँ !
हुई हैं चार आँखें ज़िन्दगी से ,
में अब हद से गुजरना चाहता हूँ !
फकीरी घुल रही है आशिकी में ,
करीने से संवरना चाहता हूँ !
डॉ॰ ब्रजेश शर्मा

ग़ज़ल

निगाहें हक़ में तो मासूम को ही माफ़ी है ,

सजा कबूल करो तुम अगर खता की है !

तमाम तोहमतें उसने हमारे सर कर दीं ,

हमारी सिम्त से ऐलाने जंग बाकी है !

कितना मुश्किल है तसव्वुर का तर्जुमा करना ,

बड़ा है काम मगर ज़िन्दगी जरा सी है !

चाँद को छूने की कोशिश हर एक लहर में है ,

हमें पता है समंदर की रूह प्यासी है !

ठहर भी जाओ मोहब्बत के इस जज़ीरे पर ,

कितनी हसरत से तुम्हे ज़िन्दगी बुलाती है !

डॉ॰ ब्रजेश शर्मा

Sunday, May 18, 2008

हिन्दी कवि सम्मेलनों के प्रसिद्ध और लोकप्रिय कवि श्री सुरेन्द्र दुबे जी का आज फिर फ़ोन आया जयपुर से । मेरे मित्र हैं और उनका विकट आत्मीय आग्रह है की उनकी शीघ्र प्रकाश्य पत्रिका ,जो की "कवि सम्मेलन" के प्रति समर्पित है , के लिए लेख / कॉलम नियमित रूप से लिखूं । अब तो उनके आग्रह की टेलीफोनिक दस्तक इतनी नियमित हो गई है कि उसकी थाप सीधे दिल पर पड़ने लगी है । बकौल दुष्यंत कुमार जी ....

" दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा जरूर ,

हर हथेली खून से तर और जियादा बेकरार !"

और जब दिल के दरवाजे पर आकर कोई अपना मित्र आवाज दे तो भला कैसे और कितनी देर चुप रहा जा सकता है ? लेकिन मित्रवर अब मैं ये कैसे आपको समझाऊं कि

" मुद्दत हुई है यार को मेहमाँ किए हुए '.........

अब न तो कवि सम्मेलनों से वैसा सतत सम्पर्क रहा और न लेखन से । जिन्दगी आजकल जिस धारा में बह रही है उसमें कविता , कवि सम्मेलन , लेखन आदि सब नेपथ्य में चले गए हैं । " फुरसत ही नही इन हाथों को अब चाक गरेबां कौन करे "

लेकिन बन्धुवर दुबे जी इन पंक्तियों को लिखते हुए ये प्रश्न जरूर उठ रहा है कि आख़िर ३०-३५ बरस पहले कि वो दीवानगी कहाँ और कैसे गुम हो गई कि जब ग्वालियर शहर से १०० किलोमीटर की परिधि में होने वाला कोई भी कवि सम्मेलन शायद ही छुटता हो ।

कवि सम्मेलन का क्या अद्भुत रोमांच था ! कितनी छुट्टियाँ कवि कविसम्मेलनों के नाम लिखी हैं ! अपनी " येज़दी " मोटर साइकिल पर एक टेप रिकॉर्डर और कोई एक कविता प्रेमी मित्र को साथ लेकर न जाने कितनी रोमांचक और अविस्मरणीय यात्राएं की हैं !

डॉ .राकेश भटनागर , श्री गंभीर सिंह, श्री शिव कुमार गोयल "गुच्चू भाई ', बसंत पाराशर आदि मित्र मेरी इस दीवानगी के संगी साथी सहयोगी और साक्षी रहे हैं ।

आज पंडित दुबे जी जब स्मृति के सरोवर में अपने आग्रह का कंकर आपने फेंका है तो अभिभूत करने वाले उन निश्चिंत और मीठे दिनों की मनोरम छबियाँ उभर रहीं हैं , और इसके लिए मैं आपका आभारी हूँ दिल से !

Thursday, May 1, 2008

कहीं भी जायें मुसलसल ये जंग जारी है,

ख़ुद अपने जिस्म पे अपनी ही रूह भारी है !

समेट लेता है नदियों के अश्क सीने में ,

इसीलिए तो समंदर की बूंद खारी है !

आपकी जेब में बस उसूल के सिक्के ।

बेटियों के दहेज़ की जबाबदारी है !

कशिश ग़ज़ल में जो उभरी है उसका राज ये है ,

बयान सबका है यारो कलम हमारी है !

डॉ.ब्रजेश शर्मा

Saturday, April 26, 2008

गो राहे शौक पे जाना बहुत जरूरी है ,

सफर में साथ सुहाना बहुत जरूरी है !

नज़र में आपकी बेशक हों आसमान मगर ,

ज़मीं पे पांव जमाना बहुत ज़रूरी है !

मोहब्बतों का है हासिल फरेब , फिर भी तो ,

बज्मे अहबाब सजाना बहुत ज़रूरी है !

सफर की हद हो जब अपनी निगाह ज़द में ,

तो मंजिलों को बढ़ाना बहुत ज़रूरी है !

नसीहतों की जो पाबंदियाँ हैं गिर्द मेरे ,

अब उनसे आँख चुराना बहुत ज़रूरी है !

गर्दिशे जीस्त भुलाने के लिए ऐ यारो ,

ग़ज़ल का एक तराना बहुत ज़रूरी है !

डॉ. ब्रजेश शर्मा