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गो राहे शौक पे जाना बहुत जरूरी है , सफर में साथ सुहाना बहुत जरूरी है ! नज़र में आपकी बेशक हों आसमान मगर , ज़मीं पे पांव जमाना बहुत ज़रूरी है ! मोहब्बतों का है हासिल फरेब , फिर भी तो , बज्मे अहबाब सजाना बहुत ज़रूरी है ! सफर की हद हो जब अपनी निगाह ज़द में , तो मंजिलों को बढ़ाना बहुत ज़रूरी है ! नसीहतों की जो पाबंदियाँ हैं गिर्द मेरे , अब उनसे आँख चुराना बहुत ज़रूरी है ! गर्दिशे जीस्त भुलाने के लिए ऐ यारो , ग़ज़ल का एक तराना बहुत ज़रूरी है ! डॉ. ब्रजेश शर्मा
तमाम तोहमतें दुनियां कि वो उठाएगा , अजब दीवाना है अपनी ही बात मानेगा ! तेरी वफ़ा ये तेरा ऐतबार , तेरा खुलूस , गुनाह से तो यक़ीनन मुझे बचा लेगा ! मेरे तमाम गुनाहों का चश्मदीद गवाह , मेरा ज़मीर ही मुंसिफ है , फैसला देगा ! मेरा मिजाज़ फ़कत उलझनों का मेला है , वो मुझ से रब्त बढ़ाकर भी और क्या लेगा ! रूह अल्फाज़ की मेरे बयान में झलके , मेरी ज़ुबान में कब ये शऊर आएगा ! डॉ. ब्रजेश शर्मा
इक दूसरे की झूठी क़सम खा रहे हैं लोग , क्या खुश नुमां फरेब जिए जा रहे हैं लोग ! क्या खूब लोग थे जो महकते हैं आज भी , अब तो बशक्ले खार नज़र आ रहे हैं लोग ! तनहा जो तूने अपना सफर तय किया तो क्या ? तेरे नक्शे पा पे आज चले जा रहे हैं लोग ! खामोशियों को शोर निगलने लगा है अब , आवाज़ फ़िर बुलंद किए जा रहे हैं लोग ! पहले तो दरीचों से लगे झांकते रहे , अब अपनी हर्क़तों पे ख़ुद शर्मा रहे हैं लोग ! जब टूट ही गया है गमे यार का तिलिस्म , फिर क्यों गमे हयात से घबरा रहे हैं लोग ! डॉ . ब्रजेश शर्मा
दिल से अह्सासे ग़म मिटा तो नहीं , ज़िंदगी ग़म का सिलसिला तो नहीं ? कह रहे हो बहार आयी है ? एक भी गुल मगर खिला तो नहीं ! चलते चलते थके कदम फिर भी , मंज़िलों का पता मिला तो नहीं ! ज़ुल्मतों का वज़ूद क़ायम है , बेसबब ही ये दिल जला तो नहीं ! कुछ तो अपना भी हक़ है गुलशन पर , फिक्रे गुलशन कोई खता तो नहीं ? बुलबुलें किसलिए क़फ़स में हैं ? चहचहाने की ये सज़ा तो नहीं ? डॉ . ब्रजेश शर्मा
माना तनहाई में घबराए बहुत , खुद के भी नजदीक तो आये बहुत ! प्यास की हो जायेगी लंबी उमर , आस के बदल अगर छाये बहुत ! तोड़ हम पाए नहीं रिश्तों के भ्रम , श्लोक गीता के तो दोहराए बहुत ! क्या हुआ अब किसलिए खामोश हैं , लोग जो भीडों में चिल्लाये बहुत ! डॉ. ब्रजेश शर्मा
दिखा के आइना नाहक बवाल कौन करे , ज़मीर ज़िःबह किया अब सवाल कौन करे ? मैं अपने आप से लड़ता हूँ ,हार जाता हूँ , इस हार जीत पे जश्नोमलाल कौन करे ? अपनी खुद्दारी ही दुश्मन है ,भला क्या कीजे , वो मान लेगा मगर अर्ज़े हाल कौन करे ? अपनी परछाई में दिखती हैं दरारें मुझको , अक्स बेजोड़ हो ऐसा कमाल कौन करे ? डॉ .ब्रजेश शर्मा
दिमागों से हटे अब ये धुंधलका , बहुत इसरार है यारो ग़ज़ल का ! कोई कैसे बचे परछाईयों से , हमारा आज है मोहताज कल का ! जरा ऊंचाईयों से देख लीजे , ये बौनापन भी राजा के महल का ! चलो हम तुम चलें ऐसी जगह अब , जहाँ पर खत्म हो अहसास पल का ! डॉ ब्रजेश शर्मा